ऑटोइम्यून बीमारियों के निदान में महिलाओं के साथ भेदभाव: नए अध्ययन से बड़ा खुलासा
· GlobeWire Daily Lifestyle Desk · Source: www.theguardian.com

चित्र स्रोत: www.theguardian.com — अधिकार सत्यापित नहीं
ऑटोइम्यून बीमारियों के निदान में लैंगिक असमानता
दुनिया भर में लगभग हर 10 में से एक व्यक्ति ऑटोइम्यून स्थितियों से प्रभावित है, जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर की रक्षा करने के बजाय उसी पर हमला करने लगती है। हालांकि, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट अंग्लिया द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन ने स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में एक गहरी लैंगिक खाई को उजागर किया है।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
शोध के अनुसार, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में गलत निदान का सामना करने की संभावना काफी अधिक होती है। आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं को ऑटोइम्यून समस्याओं के बावजूद 'मनोचिकित्सीय' (psychiatric) गलत निदान मिलने की संभावना पुरुषों की तुलना में 43% अधिक है। इसके अतिरिक्त, उन्हें 'साइकोसोमैटिक' (psychosomatic) या तनाव जनित गलत निदान मिलने की संभावना 74% अधिक पाई गई है। इसका सीधा अर्थ है कि कई मामलों में महिलाओं के शारीरिक लक्षणों को अनदेखा कर उन्हें मानसिक स्वास्थ्य समस्या मान लिया जाता है।
निदान में देरी की समस्या
अध्ययन में यह भी पाया गया कि पुरुषों और महिलाओं के बीच बीमारी की पहचान होने के समय में बड़ा अंतर है। पुरुषों को अक्सर तीन महीने के भीतर सही निदान मिल जाता है, जबकि महिलाओं को अपने लक्षणों की शुरुआत से सटीक निदान तक पहुँचने में एक से दो साल तक का लंबा समय लग जाता है।
पाठकों के लिए जानकारी
यह अध्ययन स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि आपने भी इसी तरह की स्थिति का अनुभव किया है और आप अपनी कहानी साझा करना चाहते हैं, तो आप 'द गार्जियन' के आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कर सकते हैं। यह डेटा आगे के शोध और नीतिगत बदलावों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
अधिक जानकारी कहाँ देखें
आप इस विषय पर अधिक विस्तार से जानकारी और शोध का संदर्भ आधिकारिक वेबसाइट पर देख सकते हैं: https://www.theguardian.com/wellness/2026/oct/27/woman-autoimmune-condition-community-readers
AI की सहायता से तैयार रिपोर्ट; मूल स्रोत के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।
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